शिक्षा और भिक्षा : Hindi Moral Story

एक ऊंचे दर्जे के संत महात्मा थे. वह बड़ा अच्छा प्रवचन करते थे. एक बार वह किसी गृहस्थ के घर दीक्षा के लिए गए. गृहस्वामिनी ने नमस्कार करते हुए कहा- हे गुरुदेव! आज आप मेरे घर पर पधारे हैं, यह आपका दया भाव है. मैं आपकी कृपा दृष्टि को कभी भूल नहीं सकती. आप मुझे दीक्षा ग्रहण करने के पहले शिक्षा देने की भी कृपया करें.

महात्मा जी ने गृहस्वामिनी की मन स्थिति का अध्ययन किया. वह समझ गए कि यह बहन ज्ञान की भूखी है. अंतरात्मा ने गृहस्वामिनी को उपदेश दिया.

महात्मा जी दीक्षा के लिए अगले घर पहुंचे वहां गृहस्वामिनी ने घर का दरवाजा खोला. गृहस्वामिनी बिना नमस्कार के महात्मा से कहा,- महात्मा जी! आज आप मेरे घर पर पधारे हैं .यह आपका दया भाव है आप मुझे दीक्षा ग्रहण करने के बदले में क्या देंगे.

महात्मा जी ने गृहस्वामिनी की मन स्थिति का अध्ययन किया वह समझ गए की यह उपदेश के योग्य नहीं है. जिसके मन में घमंड का कचरा भरा हुआ है. महात्मा जी ने एक तरकीब से गृहस्वामिनी को समझाने का  फैसला किया. महात्मा जी बाहर आए कमंडल को कंकर मिट्टी से भर कर वापस घर में आए और बोले बहन पहले तुम भिक्षा दो, उसके बाद मैं तुम को शिक्षा देने का प्रयास करूंगा.

गृहस्वामिनी ने कहा,- महाराज आप के कमंडल में तो मिट्टी भरी हुई हैं. मेरी खाद्य सामग्री इसमें नहीं आएगी. स्वादिष्ट पकवान इस भरे पात्र में कैसे डाल सकती हूं.

महात्मा जी ने कहा, मेरी बात समझ नहीं आई. जरा गहराई से सोचो. कमंडल में मिट्टी कंकर देखकर दीक्षा डालने में हिचकिचाहट हुई न, थोड़ा चिंतन मनन करो तुम्हारा दिल दिमाग क्रोध , लोभ व घमंड रूपी कंकर मिट्टी से भरा हुआ है, ऐसे में मेरे उपदेशों के लिए स्थान ही नहीं है.

गृहस्वामिनी ने  संकल्प किया कि पहले मैं अपने दिल और दिमाग के पात्र को खाली करूंगी ताकि भविष्य में कोई ज्ञान या उपदेश की शिक्षा प्राप्त कर सकूं.

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Bhati Neemla

हेल्लो दोस्तों! 'हिंदी में स्टोरी' पर आपका स्वागत है. मेरा नाम BS भाटी नीमला है. यह ब्लॉग उन पाठको के लिए बनाया गया है जो हिंदी कहानियों में रूचि रखते है. कृपया अपने बच्चो को ये कहानिया पढने को जरूर दे ताकि उनमे एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके.

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