बाड़ी वाला भूत (भूत की सच्ची कहानी)

बाड़ी वाला भूत (भूत की सच्ची कहानी)

राजस्थान के एक गाँव अर्जुनसर से लगभग आधा किलोमीटर पर एक बहुत बड़ा बगीचा है जिसको हमारे गाँववाले बाड़ी के नाम से पुकारते हैं. यह लगभग बारह-पंद्रह एकड़ में फैला हुआ है. इस बगीचे में आम और महुआ के पेड़ों की अधिकता है. बहुत सारे पेड़ों के कट या गिर जाने के कारण आज यह बाड़ी अपना पहलेवाला अस्तित्व खो चुकी है पर आज भी कमजोर दिलवाले व्यक्ति दोपहर या दिन डूबने के बाद इस बाड़ी की ओर जाने की बात तो दूर इस का नाम उनके जेहन में आते ही उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
आखिर क्यों? उस बाड़ी में ऐसा क्या है ?

जी हाँ, तो आज से तीस-बत्तीस साल पहले यह बाड़ी बहुत ही घनी और भयावह हुआ करती थी. दोपहर के समय भी इस बाड़ी में अंधेरा और भूतों का खौफ छाया रहता था. लोग आम तोड़ने या महुआ बीनने के लिए दल बाँधकर ही इस बाड़ी में जाया करते थे. हाँ इक्के-दुक्के हिम्मती लोग जिन्हे हनुमानजी पर पूरा भरोसा हुआ करता था वे कभी-कभी अकेले भी जाते थे. कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि रात को भूत-प्रेतों को यहाँ चिक्का-कबड्डी खेलते हुए देखा जा सकता था. अगर कोई व्यक्ति भूला-भटककर इस बारी के आस-पास भी पहुँच गया तो ये भूत उसे भी पकड़कर अपने साथ खेलने के लिए मजबूर करते थे और ना-नुकुर करने पर जमकर धुनाई भी कर देते थे. और उस व्यक्ति को तब छोड़ते थे जब वह कबूल करता था कि वह भाँग-गाँजा आदि उन लोगों को भेंट करेगा.
तो आइए उस बगीचे की एक सच्ची घटना सुनाकर अपने रोंगटे खड़े कर लेता हूँ.

भूत की सच्ची कहानी

उस बगीचे में हमारे भी बहुत सारे पेड़ हुआ करते थे. एकबार हमारे दादाजी ने आम के मौसम में आमों की रखवारी का जिम्मा गाँव के ही एक व्यक्ति को दे दी थी. लेकिन कहीं से दादाजी को पता चला कि वह रखवार ही रात को एक-दो लोगों के साथ मिलकर आम तोड़ लेता है. एक दिन हमारे दादाजी ने छिपकर सही और गलत का पता लगाने की सोची. रात को खा-पीकर एक लाठी और बैटरी (टार्च) लेकर हमारे दादाजी उस भयानक और भूतों के साम्राज्यवाले बारी में पहुँचे. उनको कोनेवाले पेड़ के नीचे एक व्यक्ति दिखाई दिया. दादाजी को लगा कि यही वह व्यक्ति है जो आम तोड़ लेता है. दादाजी ने आव देखा न ताव; और उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए लगे दौड़ने. वह व्यक्ति लगा भागने. दादाजी उसे दौड़ा रहे थे और चिल्ला रहे थे कि आज तुमको पकड़कर ही रहुँगा. भाग; देखता हूँ कि कितना भागता है. अचानक वह व्यक्ति उस बारी में ही स्थित एक बर के पेड़ के पास पहुँचकर भयंकर और विकराल रूप में आ गया. उसके अगल-बगल में आग उठने लगी. अब तो हमारे दादाजी काठ हो गए और बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया. उनका शरीर काँपने लगा, रोएँ खड़े हो गए और वे एकदम अवाक हो गए. अब उनकी हिम्मत जवाब देते जा रही थी और उनके पैर ना आगे जा रहे थे ना पीछे. लगभग दो-तीन मिनट तक बेसुध खड़ा रहने के बाद थोड़ी-सी हिम्मत करके हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे.
जब वे घर पहुँचे तो उनके शरीर से आग निकल रही थी. वे बहुत ही सहमे हुए थे. तीन-चार दिन बिस्तर पर पड़े रहे तब जाकर उनको आराम हुआ. उस साल हमारे दादाजी ने फिर अकेले उस बाड़ी की ओर न जाने की कसम खा ली.

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प्रभाकर पाण्डेय

जन्म-स्थान :गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश) शिक्षा :एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान) पिछले 19-20 वर्षों से हिन्दी की सेवा में तत्पर। पूर्व शोध सहायक (Research Associate), भाषाविद् के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मुम्बई के संगणक एवं अभियांत्रिकी विभाग में भाषा एवं कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्य। कई शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत। वर्तमान में सी-डैक मुख्यालय, पुणे में कार्यरत। विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान। विभिन्न हिंदी, भोजपुरी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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