बंदर की मूर्खता : हास्य और शिक्षाप्रद कहानी

क दिन एक कछुआ समुन्द्र के किनारे धूप सेक रहा था. उसे समुन्द्र में एक केले का पेड़ बहता हुआ दिखाई दिया.

वह उसे किनारे तक खींच लाया. लेकिन जमीन पर उसे खींचने की ताकत कछुए में नहीं थी. इसलिए वह बंदर के पास गया और बोला- “देखो मैं यह केले का पेड़ लाया हूं, इसे मेरे बगीचे तक पहुंचाने में मेरी मदद कर दो.”

बंदर बोला- “मैं तभी मदद करूंगा जब तुम मुझे मेरा हिस्सा दोगे.

कछुआ तैयार हो गया. दोनों मिलकर केले के पेड़ को बगीचे तक ले आए. बंदर बोला- “अब मेरा हिसाब कर.”

कछुए ने कहा- “पेड़ को जमीन पर लगा देते हैं जब फलेगा तो हिस्सा ले लेना.” लेकिन बंदर नहीं माना. तब उन्होंने पेड़ को काट डाला. ऊपर का हिस्सा हरा भरा था. उसमें पत्तियां थी, नीचे जड़ थी. वह हिस्सा गंदा था.

बंदर बोला – “मैं ऊपर वाला हिस्सा लूंगा.” अब दोनों ने अपना-अपना हिस्सा बगीचे में लगा लिया.

कुछ दिनों में बंदर का पेड़ सूख गया लेकिन कछुए का पेड़ बढ़ निकला. कुछ दिनों बाद कछुए के पेड़ में फल आ गए तथा पक भी गए.

लेकिन कछुआ फल नहीं तोड़ सकता था. इसलिए वह फिर बंदर के पास गया और बोला कि फल तोड़ने में मेरी मदद कर दो, मैं तुम्हें कुछ फल दूंगा.

बंदर मान गया और पेड़ पर चढ़ गया. वहां बैठकर फल चखने लगा. कछुआ नीचे से देखता रहा.

फिर कछुआ बोला – “बंदर भाई मुझे भी फल दो.” बंदर चुपचाप खाता रहा. कछुआ ने गिड़गिड़ाते हुए कहा कि बंदर भाई मुझे भी फल दो.

बंदर बोला “तुमने पहले भी मुझसे धोखा किया था. अच्छा हिस्सा अपने लिए ले लिया था और मुझे खराब वाला हिस्सा दिया था. अब मैं खाऊंगा.”

कछुआ गिड़गिड़ाता रहा और बंदर ने छिलके फेंक दिए. अब कछुए को गुस्सा आ गया. उसने आसपास से कांटे वाली गाड़ियां इकट्ठी कर ली और केले के पेड़ के नीचे जमा कर दी.

बंदर केले खाकर नीचे उतरा तो कांटे चुभ गए. दर्द से वह चिल्लाने लगा. बन्दर की मुर्खता पर दूर छिपे कछुए को हंसी आ गई. वह खिलखिलाने लगा. इस पर खिसियाकर बंदर ने उसे पटक दिया और बोला- “अब मैं तुझे पीटूंगा. बोल! छड़ियो से पिटू या ओखल में डालकर कचुंबर निकाल लूं या तुझे पहाड़ से धकेल दूं.”

कछुआ बोला – ठीक है, मेरे साथ ऐसा ही कुछ करो. चाहे मुझे पीटो, चाहे ओखल में कचूबर निकालो. मेरा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. बस मुझे पानी में मत डुबोना नहीं तो मेरी जान निकल जाएगी.”

यह सुनकर बंदर को मजा आ गया. वह बोला – “मुझे पहले क्यों नहीं सुझा. तुझे मैं पानी में ही डूबोऊगा.”

यह कहकर बंदर कछुए को पानी में ले गया और खूब गहरे पानी में उसे डुबो दिया. कछुआ डूब गया. काफी आगे जाकर वह सतह पर उत्तर आया और सर निकालकर बंदर को चिढ़ाता हुआ बोला – “धन्यवाद बंदर भाई तुम्हें नहीं मालूम कि पानी मेरा घर है.

कहानी से शिक्षा:
हमें प्रत्येक कार्य ईमानदारी व सावधानी से करना चाहिए.
दुष्ट द्वारा किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं होता.

Bhati Neemla

हेल्लो दोस्तों! 'हिंदी में स्टोरी' पर आपका स्वागत है. मेरा नाम BS भाटी नीमला है. यह ब्लॉग उन पाठको के लिए बनाया गया है जो हिंदी कहानियों में रूचि रखते है. कृपया अपने बच्चो को ये कहानिया पढने को जरूर दे ताकि उनमे एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके.

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