प्रसाद : सच्ची स्वामिभक्ति

क राजा को अपने सेवक से बहुत स्नेह था. वह सेवक था ही स्वामीभक्त, अनन्य और बहुत पुराना.

एक बार राजा ने बाग में एक फल तोड़कर काटा और बड़े चाव से एक कली सेवक को दी. सेवक ने कली खाकर कहा- “स्वामी! एक कली और.”

राजा ने कोतुहल के साथ एक कली और दे दी कि शायद सेवक को फल बहुत स्वादिष्ट लगा है. सेवक मांगता रहा और राजा सेवक को कलीयाँ देता रहा पर जब आखरी कली बची तो राजा बोला- “क्यों रे! सब तू ही खा जाएगा क्या. अब नहीं दूंगा यह कली मैं खाऊंगा.”

यह सुनकर सेवक ने झपट्टा मारकर कली लेनी चाहिए पर तब तक राजा उस कली को मुंह में रख चुका था. वह फल इतना कड़वा था कि राजा का चेहरा बिगड़ गया और उसने तुरंत कली को थूकना चाहा जिसे सेवक कितनी देर से मुस्कुराता हुआ खा रहा था.

राजा हैरान होकर बोला- “बाप रे! इतना कड़वा फल, और तू मुस्कुराता हुआ खाता रहा. तूने बताया क्यों नहीं.”

सेवक वाला- “मैं नहीं चाहता था कि मेरे मालिक को ऐसा कड़वा फल खाना पड़े इसलिए मांग मांगकर खाता गया. रही आपको बताने की बात, तो हे मालिक! जिन हाथों से हमेशा इतना कुछ मिला, सुख मिला, मीठे फल मिले उनसे कड़वा फल भी मिले तो शिकायत क्या करना.”

शिक्षा– हमेशा गुरु या मालिक के प्रति वफादार और ईमानदारी से पेश आना चाहिए.

Bhati Neemla

हेल्लो दोस्तों! 'हिंदी में स्टोरी' पर आपका स्वागत है. मेरा नाम BS भाटी नीमला है. यह ब्लॉग उन पाठको के लिए बनाया गया है जो हिंदी कहानियों में रूचि रखते है. कृपया अपने बच्चो को ये कहानिया पढने को जरूर दे ताकि उनमे एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके.

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