धोबी और बाघ : एक भोजपुरी लोककथा : हास्य कहानी

सोहन नामक एक गरीब आदमी ने एक गाँव के बाहर अपने रहने के लिए एक झोपड़ी डाल रखी थी. गाँव के नजदीक ही एक जंगल था. वह अपने परिवार का गुजर-बसर करने के लिए जंगल से मरे हुए जानवरों का चमड़ा एकत्रित करके लाता. उन चमड़ों से वह जूता बनाता और बाजार में बेंच आता. यही उसकी प्रतिदिन की दिनचर्या थी और पेट पालने का साधन.

एक दिन जब वह जंगल में चमड़ा एकत्रित कर रहा था तभी वहाँ एक बाघ आ पहुँचा. बाघ को अपनी ओर आता देख वह डर गया और बाघ से बचने का उपाय सोचने लगा. उसने भागना ठीक नहीं समझा क्योंकि अगर वह भागता तो बाघ दौड़कर पकड़ लेता. उसके दिमाग ने तेजी से काम करना शुरु किया और वह एक लकड़ी लेकर लगा जमीन नापने.

बाघ जब उसके पास आ गया तो पूछा, “यह क्या कर रहे हो?”

इसपर सोहन ने कहा, “ऐ, मेरे माई-बाप! आपकी कृपा से ही हमारा जीवन यापन हो रहा है. माँस खाने के बाद जो आप चमड़ा छोड़ देते हैं उसी चमड़े का मैं जूता बनाकर कुछ पैसे कमा लेता हूँ. मैं तो आपके पैर का निशान नाप रहा था ताकि आप अन्नदाता के लिए भी जूते बना दूँ.” सोहन की बात सुनकर बाघ बहुत ही प्रसन्न हो गया और लगा अपने पैर की नाप देने. दिखावटी नाप लेने के बाद सोहन अपनी जान बचाकर घर भाग आया.

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सोहन ने घर आकर यह घटना अपनी बीबी को सुनाया. उसकी बीबी ने कहा कि चलिए, जान तो बच गई पर अगर बाघ आपको खोजते हुए यहाँ आ गया तो क्या होगा? इसपर सोहन ने कहा कि जब बाघ यहाँ आएगा तो देखा जाएगा.

एक दिन की बात है कि सुबह से ही हल्की टीपा-टापी बारिश (बूँदा-बाँदी) हो रही थी. रात होने को आ गई. सोहन खाट पर पड़ा, सोच रहा था कि अगर ऐसे ही दिन रहेगा तो रोजी-रोटी का जुगाड़ कैसे होगा? अभी वह यही सब सोच रहा था तभी बाघ उसके घर के पिछवाड़े आकर एक पेड़ में लगा अपना शरीर रगड़ने. सोहन की बीबी ने कहा कि लगता है घर के पिछवाड़े बाघ आ गया है. इसपर सोहन ने कहा , “चुप रहो! कम डर बाघ का अधिक डर टिपटिपवा का” सोहन की बात सुनकर बाघ सोचा कि यह टिपटिपवा कौन है जिससे यह इतना डर रहा है.

तभी क्या हुआ कि सोहन के गाँव के ही एक धोबी का गधा कहीं खो गया और वह उस गधे को खोजते हुए सोहन के घर के पास आ गया और दरवाजे पर से ही सोहन को हाँक लगाया, “ए भाई! मेरे गधे को कहीं आप ने देखा है?”

इस पर सोहन ने कहा कि लगता है कि मेरे घर के पीछे है. धोबी आव देखा न ताव और चुपके से जाकर बाघ का कान पकड़कर उसकी पीठ पर बैठ गया और लगा लाठी से मारने. बाघ की अक्ल घास चरने चली गई और उसने सोचा कि कहीं यही तो टिपटिपवा नहीं.

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अब बाघ क्या करे?अपनी जान लेकर जंगल की ओर भागा. अभी वह जंगल में पहुँचने ही वाला था तभी बिजली चमकी. बिजली के चमकते ही प्रकाश हो गया और उस प्रकाश में धोबी ने देख लिया कि यह गधा नहीं बाघ है. अब धोबीराम की सीट्टी-पिट्टी गुम. वह जल्दी से बाघ की पीठ पर से कूदकर वहीं एक पीपल की धोंधर में छिप गया. यह सब खेल एक गीदड़ देख रहा थी. उसने भागते हुए बाघ को रोका और पूछा, “मामा, मामा! क्यों भाग रहो हो?” बाघ बोला, “तुम भी भागो. पीछे टिपटिपवा पड़ गया है.” इसपर गीदड़ ने कहा कि वह कोई टिपटिपवा-उपटिपवा नहीं है वह तो एक आदमी है. चलिए मैं आपको दिखाता हूँ.

जब गीदड़ बाघ के साथ पीपल के पास पहुंचा तो जिस धोंधर में धोबी छिपा हुआ था उसी में अपनी पूँछ डालकर हिलाने लगा. वह सोच रहा था कि छिपे हुए आदमी का दम घुटने लगेगा और वह बाहर आ जाएगा. पर हुआ ठीक इसके उलटा. धोबी ने अपने दाँतों से कच से गीदड़ की पूँछ काट ली. गीदड़ चिल्लाया, “भागिए मामा, भागिए. यह टिपटिपवा नहीं पूँछकटवा है.”

इसके बाद गीदड़ और बाघ जंगल में भाग गए और धोबी अपने घर चला आया. इसके बाद फिर-फिर बाघ कभी गाँव की ओर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.

प्रभाकर पाण्डेय

जन्म-स्थान :गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश) शिक्षा :एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान) पिछले 19-20 वर्षों से हिन्दी की सेवा में तत्पर। पूर्व शोध सहायक (Research Associate), भाषाविद् के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मुम्बई के संगणक एवं अभियांत्रिकी विभाग में भाषा एवं कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्य। कई शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत। वर्तमान में सी-डैक मुख्यालय, पुणे में कार्यरत। विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान। विभिन्न हिंदी, भोजपुरी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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