क्रान्तिकारी संत : एक रहस्यमयी कहानी

यह बात उस समय की है, जब देश अंग्रेजों का गुलाम था. विंध्याचल पर्वत पर एक गुफा है जो कि महाकाली के नाम से प्रसिद्ध है. वहां दिन में तो लोग महाकाली की विभूतियों के दर्शन के लिए आते-जाते रहते हैं. परंतु रात को वहां कोई नहीं आता है.

परंतु एक दिन लोगों ने कोतूहल से देखा की महाकाली गुफा में एक संत साधना में बैठे थे. उनकी आयु 50-55 वर्ष की थी. गौर वर्ण और जटाधारी थे. उनके मुख पर तेज था. उन्होंने भगवा धारण कर रखा था. उनके पास चिमटा और कमंडल पड़ा था.

इस संत के बारे में चारों और चर्चा फैल गई. लोग अपनी परेशानियों को लेकर संत से मिलने लगे परंतु संत बड़ी कठिनाई से लोगों से मिलते और उनकी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश करते. लोग जब मिलने आते हैं. तो वे उनसे बात नहीं करते थे. मोन ही रहते. किसी भी प्रकार का चढ़ावा ग्रहण नहीं करते थे.

संत के इस तरह के आचरण से लोग उनकी ओर आकर्षित होने लगे. उनको महान संत समझकर अपने-अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए उनके पास आने लगे परंतु संत न तो किसी से बात करते और न ही करने देते. इशारों से ही अपनी बात को समझा देते. लोगों द्वारा अंदाजा लगाया जाने लगा, कोई कहता संत पहुंचे हुए सिद्ध महात्मा है, कोई कहता संत डाकू है, तो कोई कहता संत बड़े क्रांतिकारी हैं.

संत की बात चारों ओर फैल गई. अंग्रेज अधिकारियों को भी इसकी भनक पड़ गई. उनको भी अचंभा हुआ कि अचानक यह संत कहां से प्रकट हुए हैं. उन्होंने संत के बारे में जानने के लिए गुप्तचर नियुक्त कर दिए. गुप्तचर उन पर निगाह रखने लगे. संत कहां जाते हैं, क्या खाते हैं, क्या करते हैं. सभी क्रियाओं पर गुप्तचर नजर रख रहे थे.

एक रात करीब एक बजे का समय था. संत हाथ में झोला लिए गुफा से बाहर निकले. गुप्तचर संत का पीछा करने लगे. संत गंगा किनारे पहुंचकर एक नाव में बैठ गए. नाव उन्हें लेकर दूसरी पार ले गई. करीब तीन घंटे बाद संत नाव के साथ आये और गुफा में चले गये.

संत की प्रत्येक क्रिया को गुप्तचर देख रहे थे. गुप्तचर ने सोचा इतनी रात गए संत कहां और किस से मिलने गए थे. गुप्तचरो को संत पर संदेह हो गया. गुप्तचरों को लगा कि संत कोई सिद्ध महात्मा नहीं है वह या तो डाकू है या क्रांतिकारी.

गुप्तचरों को नियुक्त करने वाले अधिकारियों के पास यह खबर पहुंच गई. अधिकारियों ने संत को पकड़ने की योजना बनाई. सूर्योदय होने से पहले ही पुलिस ने गुफा को चारों ओर से घेर लिया. पुलिस के जवानों ने गुफा में प्रवेश किया तो देखा कि गुफा में कोई भी नहीं था. पुलिस के जवानों ने जब तलाशी ली तो वहां एक पत्र मिला. पत्र हिंदी भाषा में लिखा हुआ था.

उसमें लिखा था- “तुम लोगों ने हमारे पीछे गुप्तचर लगाए हैं. तुम सोचते हो कि हमें इसकी कोई खबर नहीं. जिस प्रकार तुम्हारे गुप्तचर हमारे पीछे लगे हैं, उसी प्रकार हमारे गुप्तचर भी तुम लोगों की खबर हमें देते रहते हैं. हम शरीर छोड़ देंगे परंतु तुम्हारे बंधन में नहीं आएंगे.”

अंग्रेज अधिकारी संत की खोज में लग गए. लगभग दो वर्ष बाद एक दिन अखबार में खबर छपी की गंगा किनारे रहने वाले एक संत की झोपड़ी में बम विस्फोट से मृत्यु. संत की झोपड़ी पर सुप्रसिद्ध क्रांतिकारियों की चिट्ठियां मिली. जिससे यह पता चलता है कि संत क्रांतिकारियों के लिए बम तैयार करते थे.

संत का नाम पता अभी तक नहीं खोज पाए. क्षेत्र के लोगों में सनसनी फैल गई की गुफा में रहने वाले संत बहुत बड़े क्रांतिकारी थे. जिसने देश की आजादी में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया.

Bhati Neemla

हेल्लो दोस्तों! 'हिंदी में स्टोरी' पर आपका स्वागत है. मेरा नाम BS भाटी नीमला है. यह ब्लॉग उन पाठको के लिए बनाया गया है जो हिंदी कहानियों में रूचि रखते है. कृपया अपने बच्चो को ये कहानिया पढने को जरूर दे ताकि उनमे एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके.

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