कौआ और सांप

एक बरगद का पेड़ था. उस पेड़ पर एक कौवा और कोवी दोनों पति-पत्नी बहुत अच्छी तरह घोसला बनाकर रहते थे. दोनों की जिंदगी बहुत ही अच्छी जिंदगी बिना किसी दुख के बीत रही थी।

एक दिन की बात है कि एक सांप कहीं से भूले-भटके उस पेड़ पर जा टिका और पेड के चारों तरफ ,नीचे और ऊपर चढ़ के चारों तरफ घूमने लगा. घूमते-घूमते जब पेड के ऊपर गया तो उसकी नजर घोंसले पर पड़ी. वह धीरे-धीरे गया उसमें देखा कि अंडे पड़े है, उसका मन खुश हो गया । उधर कोवा और कोवी जो देख रहे थे कि हमारे घोंसले पर सांप है तो दौड़े-दौड़े अपने घोंसले के नजदीक आए लेकिन सांप के डर से अपने अंडों तक नहीं पहुंच सके । उधर सांप आराम से बिना किसी डर के सभी अंडों को खा गया। कौआ और कोवी कितना भी रोए चिलाएं, शोर मचाया ,मगर  सांप ने एक भी नहीं सुनी । सांप भी उसी पेड़ पर बिल बनाकर रहने लगा, वहा कोई भी पक्षी उसकी मदद के लिए नहीं आया . जो भी अंडा देता सांप खा जाता । ऎसी कष्ट भरी अपनी जिंदगी से कोवा और कोवी उदास हो व चिंतित रहने लगे ,एक मन होता कि कहीं दूर जाकर घोंसला बना लूं और उसी में रहूं , फिर मन कहता कि यह तो कायरता का काम है डर कर भागना दोनों पति-पत्नी को सही नहीं लगा. वे दिन रात ना कुछ खाते और ना कुछ पीते बस इसी सोच में लगे रहते थे।

एक दिन कौआ उड़ते-उड़ते बाजार की तरफ चला गया. अचानक उसकी नजर सोने की हार पर पड़ी उसे लेने बहुत से आदमी दौड़ पड़े, कौवे के मन में आया कि क्यों न इस हार को सांप के बिल डाल दूं और सांप को मरवा दूं क्योंकि सोने का हार लेने तो लोग मेरे पीछे आएंगे, ऐसा सोचकर कोवा हार लेकर उड़ते-उड़ते अपने पेड़ की तरफ आ गया और हार को सांप के बिल गिरा दिया, पीछे से लोगो ने देखा की हार उस बिल में गिर गया। हार को उस बिल से जैसे ही निकालना चाहा सांप बाहर आया तब सब ने मिलकर सांप को मार दिया। तब तो कोवा और कोवी बहुत खुश हुए, फिर से नई जिंदगी की शुरुआत की और उसी पेड़ पर रहने लगे ।

शिक्षा- किसी को भी नहीं सताना चाहिए ।

लेखिका – दीपा कुमारी

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Bhati Neemla

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