एक अजीब लड़की : भूत को दे बेठी दिल : भूत से प्रेम की कहानी : भाग 2

पहले भाग में  : वह लगभग 1 घंटे तक बगीचे में रही और फिर घर वापस आ गई. घर आने के बाद मित्तू पता नहीं किन यादों में खोई रही.
उसी दिन फिर से खड़खड़ दुपहरिया में मित्तू का जी नहीं माना और वह साइकिल उठाकर बगीचे की ओर चली गई.

पहला भाग यहाँ से पढ़े

अब आगे: बगीचे में 3-4 राउंड साइकिल दौड़ाने के बाद फिर मित्तू एक आम के पेड़ के नीचे सुस्ताने लगी. उसे कुछ सूझा, वह हल्की सी मुस्काई और अपने दुपट्टे को अपने सर के नीचे लगाकर सोने का नाटक करने लगी. अभी मित्तू को लेटे 2-4 मिनट भी नहीं हुए थे कि उसे ऐसा लगा कि कोई उसके बालों में अंगुली पिरो रहा है. वह कुछ बोली नहीं पर धीरे-धीरे अपना हाथ अपने सर पर ले गई. वह उस अंगुलियों को पकड़ना चाहती थी जो उसके बालों में घुसकर बालों से खेलते हुए उसे एक सुखद आनंद की अनुभूति करा रही थीं. पर उसने ज्यों अपने हाथ अपने सर पर ले गई, वहाँ उसे कुछ नहीं मिला पर ऐसा लग रहा था कि अभी भी कुछ अंगुलियाँ उसके बालों से खेल रही हैं. मित्तू को बहुत ही अचंभा हुआ और वह तुरंत उठकर बैठ गई. पीछे सर घुमाकर देखी तो गजब हो गया. पीछे कोई नहीं था. उसे लगा कि शायद जो था वह इस पेड़ के पीछे छिप गया हो. पर फिर उसके मन में एक बात आई कि जब वह अपना हाथ सर पर ले गई थी तो वहाँ कुछ नहीं मिला था फिर भी बालों में अंगुलियों के सुखद स्पर्श कैसे लग रहे थे. खैर वह उठ कर खड़ी हो गई और पेड़ के पीछे चली गई पर वहाँ भी कोई नहीं. अब वह बगीचे में आस-पास दौड़ लगाई पर से कोई नहीं दिखा. फिर वह अपने साइकिल के पास आई और तेजी से चलाते हुए गाँव की ओर भागी. उसे डर तो नहीं लग रहा था पर कहीं-न-कहीं एक रोमांचित अवस्था जरूर बन गई थी, जिससे उसके रोंगटे खड़े हो गए थे.

आज की रात फिर मित्तू सो न सकी. आज कल उसे अपने आप में बहुत सारे परिवर्तन नजर आ रहे थे. उसे ऐसा लगने लगा था कि वह अब विवाह योग्य हो गई है. वह बार-बार शीशे में अपना चेहरा भी देखती. अब उसमें थोड़ा शर्माने के गुण भी आ गए थे. बिना बात के ही कुछ याद करके उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान फैल जाती. पता नहीं क्यों उसे लगने लगा था कि उसके बालों से खेलने वाला कोई उसके गाँव का नहीं, अपितु कोई दूसरा सुंदर युवा है, जो प्यार से वशीभूत होकर उसके पास खींचा चला आता है और चुपके से उसके बालों से खेलने लगता है. फिर उसके दिमाग में कौंधा कि जो भी है, है वह बहुत शर्मीला और साथ ही फुर्तीला भी. क्योंकि पता नहीं कहाँ छूमंतर हो गया कि दिखा ही नहीं. मित्तू के दिमाग में बहुत सारी बातें दौड़ रही थीं पर सब सुखद एहसास से भरी, रोमांचित करने वाली ही थीं.

अब तो जब तक मित्तू अपने बगीचे में जाकर 1-2 घंटे लेट नहीं लेटी तब तक उसका जी ही नहीं भरता. मित्तू का अब प्रतिदिन बगीचे में जाना और एक अलौकिक प्रेम की ओर कदम बढ़ाना शुरू हुआ. एक ऐसा अनजाना, नासमझ प्रेम जो मित्तू के हृदय में हिचकोले ले रहा था. वह पूरी तरह से अनजान थी इस प्रेम से, फिर भी हो गई थी इस प्रेम की दिवानी. पहली बार प्रेम के इस अनजाने एहसास ने उसके हृदय को गुदगुदाया था, एक स्वर्गिक आनंद को उसके हृदय में उपजाया था.

एक दिन सूर्य डूबने को थे. चरवाहे अपने गाय-भैंस, बकरियों को हांकते हुए गाँव की ओर चल दिए थे. अंधेरा छाने लगा था. ऐसे समय में मित्तू को पता नहीं क्या सूझा कि वह अपनी साइकिल उठाई और बगीचे की ओर चली गई. आज उसने बगीचे में पहुँच कर साइकिल को एक जगह खड़ा कर खुद ही पास में खड़ी हो गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसे पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि कोई तो है जो अभी उसे उस बगीचे में बुलाया और वह भी अपने आप को रोक न सकी और खिंचते हुए इस बगीचे की ओर चली आई. 2-4 मिनट खड़ा रहने के बाद मित्तू थोड़ा तन गई, अपने सुकोमल हृदय को कठोर बनाकर बुदबुदाई, “अगर यह कोई इंसान न होकर, भूत निकला तो! खैर जो भी हो, मुझे पता नहीं क्यों, इस रहस्यमयी जीव से मुझे प्रेम हो गया है. भूत हो या कोई दैवी आत्मा, अब तो मैं इससे मिलकर ही रहूँगी. इंसान, इंसान को अपना बनाता है, मैं अब इस दैवी आत्मा को अपना हमसफर बनाऊंगी. देखती हूँ, इस अनजाने, अनसमझे प्यार का परिणाम क्या होता है? अगर वह इंसान नहीं तो कौन है और किस दुनिया का रहने वाला है, कैसी है उसकी दुनिया?” यह सब सोचती हुई, मित्तू अपने साइकिल का हैंडल पकड़ी और उसे डुगराते हुए बगीचे से बाहर आने लगी. अब बगीचे में पूरा अंधेरा पसर गया था और साथ ही सन्नाटा भी. हाँ रह-रह कर कभी-कभी गाँव की ओर से कोई आवाज उठ आती थी.

(शेष अगले अंक में…..हाँ एक बात जो अभी परदे में है, उसे पता देना ही ठीक समझूँगा ताकि आप लोग अपने दिमाग पर अधिक जोर न डालें. मित्तू का वह अनजाना, अनसमझा प्रेम वास्तव में अलौकिक था, क्योंकि वह एक आत्मा के प्यार में पड़ गई थी…….अरे प्रभो…रूकिए अगली कहानी में सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा. हाँ एक बात हमारी ये काल्पनिक भूतही कहानियाँ आपको कैसी लगती हैं.. जरूर बताएं. धन्यवाद.. जय बजरंग बली…)

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प्रभाकर पाण्डेय

जन्म-स्थान :गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश) शिक्षा :एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान) पिछले 19-20 वर्षों से हिन्दी की सेवा में तत्पर। पूर्व शोध सहायक (Research Associate), भाषाविद् के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मुम्बई के संगणक एवं अभियांत्रिकी विभाग में भाषा एवं कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्य। कई शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत। वर्तमान में सी-डैक मुख्यालय, पुणे में कार्यरत। विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान। विभिन्न हिंदी, भोजपुरी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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