एक अजीब लड़की : भूत को दे बेठी दिल : भूत से प्रेम की कहानी : भाग-1

मित्तू, जी हाँ, यही तो नाम था उस लड़की का. मित्तू अपने माँ-बाप की एकमात्र संतान थी. मित्तू सोलह साल की थी. उसके माँ-बाप उसका बहुत ही ख्याल रखते थे और उसकी हर माँग पूरी करते थे. अरे यहाँ तक कि, हमारे गाँव-जवार के बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि गाँव क्या पूरे जवार में सबसे पहले साइकिल मित्तू के घर पर ही खरीद कर आई थी. उस साइकिल को देखने के लिए गाँव-जवार टूट पड़ा था.

मित्तू उस समय उस साइकिल को लंगड़ी चलाते हुए गढ़ही, खेत-खलिहान सब घूम आती थी. मित्तू बहुत ही नटखट थी और लड़कों जैसा मटरगस्टी करती रहती थी. वह लड़कों के साथ कबड्डी, चिक्का आदि खेलने में भी आगे रहती थी.

एक बार कबड्डी खेलते समय गलगोदही करने को लेकर झगड़ा हो गया. अरे देखने वाले तो बताते हैं कि मित्तू ने विपक्षी टीम के लड़कों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा था, पानी पिला-पिला कर मारा था. किसी के दाँत से खून निकल रहा था तो कोई चिल्लाते हुए अपने घर की ओर भाग रहा था. मित्तू से उसके हमउम्र लड़के पंगा लेना उचित नहीं समझते थे. क्योंकि उसके हमउम्र लड़के उसे उजड्ड और झगड़ालू टाइप की लड़की मानते थे. कोई उसके मुँह लगना पसंद नहीं करता था, हाँ यह अलग बात थी कि सभी लड़के उससे डरते थे.

मई का महीना था, कड़ाके की गर्मी पड़ रही थी. मित्तू खर-खर दुपहरिया में अपनी साइकिल उठाई और गाँव से बाहर अपने बगीचे की ओर चल दी. उसका बगीचा धोबरिया गढ़ई के किनारे था. इस बगीचे में आम और महुए के पेड़ों की अधिकता थी. यह बगीचा गाँव से लगभग 1 किमी की दूरी पर था. बगीचे में पहुँचकर पहले तो मित्तू खूब साइकिल हनहनाई, पूरे बगीचे में दौड़ाई और पसीने से तर-बतर हो गई. उसने बगीचे के बीचोंबीच एक मोटे आम के पेड़ के नीचे साइकिल खड़ी करके अपने दुपट्टे से चेहरे का पसीना पोछने लगी. पसीना-ओसीना पोछने के बाद, पता नहीं मित्तू को क्या सूझा कि वह उसी पेड़ के नीचे अपना दुपट्टा बिछाकर उस पर लेट गई.

बगीचे में लेटे-लेटे ही मित्तू का मन-पंछी उड़ने लगा. वह सोचने लगी कि उसके बाबूजी उसके लिए एक वर की तलाश कर रहे हैं. वह थोड़ा सकुचाई, थोड़ा मुस्काई और फिर सोचने लगी, एक दिन एक राजकुमार आएगा और उसे बिआह कर ले जाएगा. पता नहीं वह कैसा होगा, कौन होगा, कहाँ का होगा? पता नहीं मैं उसके साथ खुश रह पाऊंगी कि नहीं. पर खैर जो ईश्वर की मर्जी होगी वही होगा. बाबूजी उसके लिए जैसा भी लड़का खोजेंगे वह उसी से शादी करके खुश रहेगी. उसे पक्का विश्वास था कि उसके बाबूजी उसकी शादी जरूर किसी धनवान घर में करेंगे. जहाँ उसकी सेवा के लिए जरूर कोई न कोई नौकरानी होगी.

अभी मित्तू इन्ही सब विचारों में खोई थी कि उसे ऐसा आभास हुआ कि उसके सिर के तरफ कोई बैठकर उसके बालों में अंगुली पिरो रहा है. मित्तू के साथ ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था. ये तो आए दिन की बात थी. बकरी-गाय आदि चराने वाले लड़कियाँ या लड़के चुपके से उसके पीछे बैठकर उसके बालों में अंगुली पिरोते या सहलाते रहते थे. और मित्तू भी खुश होकर उन्हें थोड़ा-बहुत अपना साइकिल चलाने को देती थी. पर पता नहीं क्यों, आज मित्तू को यह आभास हो रहा था कि अंगुली कुछ इस तरह से पिरोई जा रही है कि कुछ अलग सा ही एक अनजान आनंद का एहसास हो रहा है. ऐसा लग रहा है कि कोई बहुत ही प्रेम से बालों को सहलाते हुए अपनी अंगुलियां उसमें पिरो रहा है. आज मित्तू को एक अलग ही आनंद मिल रहा था, जिसमें उसके यौवन की खुमारी भी छिपी लग रही थी. उसके शरीर में एक हल्की सी गुदगुदी हो रही थी और उसे अंगड़ाई लेने की भी इच्छा हो रही थी. पर वह बिना शरीर हिलाए चुपचाप लेटी रही. उसे लगा कि अगर उठकर बैठ गई तो यह स्वर्गिक आनंद पता नहीं दुबारा मिलेगा कि नहीं. उसने बिना पीछे मुड़े ही धीरे से कहा कि 10 मिनट और ऐसे ही उंगुलियाँ घुमाओ तो मैं 1 घंटे तक तुम्हें साइकिल चलाने के लिए दूँगी पर पीछे से कुछ भी आवाज नहीं आई, फिर भी मित्तू मदमस्त लेटी रही. उसे हलकी-हलकी नींद आने लगी.

शाम हो गई थी और मित्तू अभी भी बगीचे में लेटी थी. तभी उसे उसके बाबूजी की तेज आवाज सुनाई दी, “मित्तू, बेटी मित्तू, अरे कब से यहाँ आई है. मैं और तुम्हारी माँ कब से तुम्हें खोज रहे हैं. इस सुनसान बगीचे में जहाँ कोई भी नहीं है, तूँ निडर होकर सो रही है.” मित्तू ने करवट ली और अपने बाबूजी को देखकर मुस्काई. उसके बाबूजी उसे घर चलने के लिए कहकर घर की ओर चल दिए. मित्तू उठी, साइकिल उठाई और लगड़ी मारते हुए गाँव की ओर चल दी.

उस रात पता नहीं क्या हुआ कि मित्तू ठीक से सो न सकी. पूरी रात करवट बदलती रही. जब भी सोने की कोशिश करती, उसे बगीचे में घटी आज दोपहर की घटना याद आ जाती. वह बार-बार अपने दिमाग पर जोर डाल कर यह जानना चाहती थी कि आखिर कौन था वह??? वह अब पछता रही थी, उसे लग रहा था कि पीछे मुड़कर उसे उससे बात करनी चाहिए थी. लेकिन वह करे भी तो क्या करे, उस अनजान व्यक्ति के कोमल, प्यार भरे स्पर्शों से उसे अचानक कब नींद आ गई थी पता ही नहीं चला था. अरे अगर उसके बाबूजी बगीचे में पहुँच कर उसे जगाते नहीं तो पता नहीं कब तक सोती रहती?

सुबह जल्दी जगकर मित्तू फिर अपनी साइकिल उठाई और उस बगीचे में चली गई. सुबह की ताजी हवा पूरे बगीचे में हिचकोले ले रही थी पर पता नहीं क्यों सरसराती हवा में, पत्तियों, टहनियों से बात करती हवा में मित्तू को एक भीनी-भीनी मदमस्त कर देने वाली सुगंध का आभास हो रहा था. उसे ऐसा लग रहा था कि आज पवन देव उसके बालों से खेल रहे हैं. वह लगभग 1 घंटे तक बगीचे में रही और फिर घर वापस आ गई. घर आने के बाद मित्तू पता नहीं किन यादों में खोई रही.

उसी दिन फिर से खड़खड़ दुपहरिया में मित्तू का जी नहीं माना और वह साइकिल उठाकर बगीचे की ओर चली गई. (शेष अगले भाग में… )

अगला भाग यहाँ से पढ़े 

प्रभाकर पाण्डेय

जन्म-स्थान :गोपालपुर, पथरदेवा, देवरिया (उत्तरप्रदेश) शिक्षा :एम.ए (हिन्दी), एम. ए. (भाषाविज्ञान) पिछले 19-20 वर्षों से हिन्दी की सेवा में तत्पर। पूर्व शोध सहायक (Research Associate), भाषाविद् के रूप में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मुम्बई के संगणक एवं अभियांत्रिकी विभाग में भाषा एवं कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्य। कई शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत। वर्तमान में सी-डैक मुख्यालय, पुणे में कार्यरत। विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान। विभिन्न हिंदी, भोजपुरी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।

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