अनाथाश्रम : दिल को छु लेने वाली एक कहानी

क बार एक घर में बाप और बेटा दोनों रहते थे. परिवार में कोई औरत ना होने की वजह से वे खाना अधिक खुद ही तैयार करते थे. हर रोज खाना पकाने की दिक्कत से परेशान होकर बाप ने फैसला किया कि वह अपने बेटे की शादी करेगा.

इसी प्रकार बाप ने अपने बेटे की शादी कर दी और अपने बेटे की बहू को घर ले आया. बेटे की बहू आ जाने से सब कुछ ठीक चलने लग गया था.

कुछ वर्ष बाद अचानक बाप की तबीयत खराब हो गई और वे अत्यधिक बीमार हो गए. बहू रोजाना अपने ससुर को दवा दे देती और उनकी देखभाल करती किंतु बाप की तबीयत वैसी की वैसी ही थी. इस रोजाना की देखभाल व दवादि देते-देते बहू थक चुकी थी. दूसरी तरफ अब उनकी तबीयत अत्यधिक खराब हो चुकी थी. वह दिनभर खांसते रहते और अपनी बहू को दवा पानी के लिए कहते रहते.

बेटे की बहु अपने पति से कहने लगे कि मेरी मानो तो आप अपने पिताजी को अनाथाश्रम छोड़ आओ. मैं तो इन से तंग आ गई हूं. यह सारा दिन खांसते रहते हैं और यह मुझको अच्छा नहीं लगता. ऊपर से कभी दवा मांगते हैं तो कभी पानी.

बेटा बोला- “नहीं भाग्यवान! वह मेरे पिताजी हैं. भला मैं उन्हें कैसे अनाथाश्रम छोड़ सकता हूं.”

पत्नी बोली- “मुझे नहीं मालूम; आप चाहे तो मुझे इस घर में रखे या फिर अपने पिताजी को.”

पति कुछ समय सोचने के बाद अपने पापा के कुछ कपड़े थेले में डालता है. वह पापा को लेकर अनाथाश्रम छोड़ने के लिए चल पड़ा.

जब वह अनाथाश्रम पहुंचा तो अनाथाश्रम का हेड उन्हें देखते ही फोरन उनके पास चला और उनके पापा को देखकर बोला- “अरे, आप यहां पर! आप की तबीयत ये कैसे हो गई.”

पिताजी ने कुछ जवाब नहीं दिया. किंतु बेटा बोला- “मैं अपने पापा को अनाथाश्रम छोड़ने के लिए आया हूं.”

अनाथाश्रम के हेड ने पूछा- “किस कारण?”

बेटा बोला- “पापा सारा दिन खांसते रहते हैं जो मेरी पत्नी को हरगिज पसंद नहीं है, इसलिए मैं अपने पिताजी को आपके अनाथाश्रम में छोड़ने के लिए आया हूं.”
इतनी बात सुनते ही हैड की आंखों में पानी आ गया और वह बोले- “ए मूर्ख! तू जानता भी है कि यह महापुरुष कौन हैं. जिन्हें आज तू अनाथाश्रम छोड़ने के लिए आया है ये वही इंसान है जो आज से 25 साल पहले आपको इसी अनाथाश्रम से ले गए थे.”

इतनी बात सुनते ही बेटे की आंखें आंसुओं से भर गई. अनाथाश्रम का मालिक वाला- “बेटे! आप जाओ. हमारे पूरे अनाथाश्रम को संभालने वाले इस महापुरुष की देखभाल हम स्वयं कर लेंगे.”

बेटा रोते-रोते घर की ओर चला गया और वह अंदर से काफी शर्मिंदा था. वह जब घर पहुंचा तो उसकी बीवी ने पूछा- “जी! आप उदास क्यों हो? क्या हुआ?”

तो उसने सारी बात सुनाई. पत्नी ने सुना तो उसकी आंखों में भी आंसू आ गए और वह भी शर्मिंदगी महसूस करने लगी और अपने पति से कहने लगी कि जी चलो! हम अभी अपने पापा जी को घर वापस लेकर आते हैं.

दोनों पापा को लेने अनाथाश्रम पहुंचे तो क्या देखा कि जिस महापुरुष को वह अनाथाश्रम छोड़ कर आए थे उनकी मृत्यु हो चुकी है और अनाथाश्रम के सभी परिक्रमी उस महापुरुष की अर्थी पर रो रहे हैं.

उसे देख दोनों पति-पत्नी रोने लगे और तभी अनाथाश्रम का मालिक आया और बोला- “बेटा रोओं नहीं! आपके पापा की आखिरी ख्वाहिश यही थी कि जब मैं मेरे बेटे को यहां लेकर गया था. तब से लेकर आज तक मैंने उसकी आंख में पानी तक नहीं आने दिया, फिर अगर वह आज यहां आकर रोएगा तो मेरी आत्मा दुखी होगी. इतनी बात सुन बेटा दिल ही दिल में रोने लगा और अपने किए पर पछताने लगा.
इसी प्रकार बेटे ने शाम को अपने पापा की चिता को आग दी और घर चला गया. वह घर में अपने पापा की यादों में खोया हुआ गुमसुम बैठा रहता, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था वह खुद को अपने पापा की मृत्यु का सबसे बड़ा दोषी समझने लगा था.

कहानी  से शिक्षा-

  • हमें इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कोई भी कार्य जल्दबाजी में आकर नहीं करना चाहिए अन्यथा बाद में पछतावा ही होता है.
  • हमें अपने बड़े बुजुर्गों का आदर सम्मान करना चाहिए. हमें कभी भी किसी भी लालच या मजबूरी में आकर अपने बुजुर्गों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए.

Bhati Neemla

हेल्लो दोस्तों! 'हिंदी में स्टोरी' पर आपका स्वागत है. मेरा नाम BS भाटी नीमला है. यह ब्लॉग उन पाठको के लिए बनाया गया है जो हिंदी कहानियों में रूचि रखते है. कृपया अपने बच्चो को ये कहानिया पढने को जरूर दे ताकि उनमे एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके.

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